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Thursday, 26 September 2013

भगत सिंह

भगत सिंह
ਭਗਤ ਸਿੰਘ
२८ सितम्बर, १९०७ से २३ मार्च, १९३१ (२३ वर्ष की आयु में फाँसी।)
Bhagat Singh 1929 140x190
जन्मस्थल :गाँव बंगा, जिला लायलपुरपंजाब (अब पाकिस्तान में)
मृत्युस्थल:लाहौर जेल, पंजाब (अब पाकिस्तान में)
आन्दोलन:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
प्रमुख संगठन:नौजवान भारत सभा, हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन, अभिनव भारत
भगत सिंह का जन्म[1] २८ सितंबर, १९०७ में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। उनके परिवार पर आर्य समाज व महर्षि दयानन्द की विचारधारा का गहरा प्रभाव था ! अधिकांश क्रांतिकारियों को देश प्रेम की प्रेरणा महर्षि दयानन्द के साहित्य व आर्य समाज से मिली ! अमृतसर में १३ अप्रैल, १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इभगत सिंह का जन्म[2] २८ सितंबर, १९०७ में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। अमृतसर में १३ अप्रैल, १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन । इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थितब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।तने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन । इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। 

उस समय भगत सिंह करीब १२ वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गये। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिये रास्ता चुनने लगे। गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण देश के तमाम नवयुवकों की भाँति उनमें भी रोष हुआ और अन्ततः उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिये क्रान्ति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। कुछ समय बाद भगत सिंह करतार सिंह साराभा के संपर्क में आये जिन्होंने भगत सिंह को क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने की सलाह दी और साथ ही वीर सावरकर की किताब 1857 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पढने के लिए दी, भगत सिंह इस किताब से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने इस किताब के बाकी संस्करण भी छापने के लिए सहायता प्रदान की, जून 1924 में भगत सिंह वीर सावरकर से येरवडा जेल में मिले और क्रांति की पहली गुरुशिक्षा ग्रहण की, यही से भगत सिंह के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया, उन्होंने सावरकर जी के कहने पर आजाद जी से मुलाकात की और उनके दल में शामिल हुए| बाद में वे अपने दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों के प्रतिनिधि भी बने। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, भगवतीचरण व्होरा, सुखदेवराजगुरु इत्यादि थे।

लाला जी की मृत्यु का प्रतिशोध[संपादित करें]

१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गयी योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि वो ख़राब हो गयी हो । गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गये। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० वी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।
१७ दिस्मबर १९२८ को करीब सवा चार बजे, स्काट की जगह, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिसके तुरन्त बाद वह होश खो बैठा। इसके बाद भगत सिंह ने ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - "आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया ।

एसेम्बली में बम फेंकना[संपादित करें]

भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से पूरी तरह प्रभावित थे। यही नहीं, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे। इसी कारण से उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनायी थी।
भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब! - जिन्दाबाद!! साम्राज्यवाद! - मुर्दाबाद!!" का नारा[3] लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

जेल के दिन[संपादित करें]

जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ?" जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे। yes

फ़ाँसी[संपादित करें]

२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद 'बिस्मिल' की जीवनी[4] पढ़ रहे थे जो सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान का एक सूबा) के एक प्रकाशक भजन लाल बुकसेलर ने आर्ट प्रेस, सिन्ध से छापी थी। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो ।"
फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।
फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गान्धी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे । इस कारण जब गान्धी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गान्धीजी का स्वागत किया । एकाध जग़ह पर गान्धी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।

व्यक्तित्व[संपादित करें]

सुखदेवराजगुरु तथा भगत सिंह के लटकाये जाने की ख़बर - लाहौर से प्रकाशित द ट्रिब्युन के मुख्य पृष्ठ पर।
जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है । उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबी एवम् उर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किये गये अत्याचार को ।
भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी । उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये । इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया[5]। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।[6] फाँसी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था -
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें।।
इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।

ख्याति और सम्मान[संपादित करें]

उनकी मृत्यु की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा । इसके बाद भी कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छपे, पर चूँकि भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबन्ध लगा था इसलिये भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी । देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया।
दक्षिण भारत में पेरियार ने उनके लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ?" पर अपने साप्ताहिक पत्र कुडई आरसू के २२-२९ मार्च, १९३१ के अंक में तमिल में सम्पादकीय लिखा । इसमें भगतसिंह की प्रशंसा की गई थी तथा उनकी शहादत को गान्धीवाद के उपर विजय के रूप में देखा गया था।
आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी।

Marathi Kavita

जेव्हा कुणी हे नव्हते माझ्या सोबतीला 
तेव्हा कविता होत्या माज्या संगतीला 

कवितेत मन रमवून घेण्याची सवय झाली 
नंतर स्वतःला कविता करायची इच्छा झाली 

कळले नाही मला केव्हा या माझ्या मैत्रिणी झाल्या 
कळले नाही मला कशा या माझ्या अंग वळणी पडल्या 

माझ्या मनातले गुपित त्या माझ्या आधी समजू लागल्या 
मनातले विचार शब्द होऊनी पानावर उतरवू लागल्या 

काय जादू आहे या कवितांमध्ये माझे मला कळेना 
माझ्या मनातील कविता काही केल्या मला उमजेना    

                                अश्विनी दाभोळकर, 
                                `निशब्द प्रेम' अद्मीन  

Tukaram Gatha


               समचरणदृष्टि विटेवरी साजिरी । तेथें माझी हरी वृत्ति राहो ॥1॥   
                 आणीक न लगे मायिक पदार्थ । तेथें माझें आर्त्त नको देवा ॥ध्रु.॥
                 ब्रह्मादिक पदें दुःखाची शिराणी । तेथें दुश्चित झणी जडों   देसी ॥2॥
                 तुका ह्मणे त्याचें कळलें आह्मां वर्म । जे जे कर्मधर्म नाशवंत॥3॥
2
               सुंदर तें ध्यान उभे विटेवरी । कर कटावरी ठेवूनियां ॥1॥ 
                 तुळसीचे हार गळां कासे पीतांबर । आवडे निरंतर तें चि रूप ॥ध्रु.॥
                 मकरकुंडलें तळपती श्रवणीं । कंठीं कौस्तुभमणि विराजित ॥2॥
                 तुका ह्मणे माझें हें चि सर्व सुख । पाहीन श्रीमुख आवडीनें ॥3॥
3
               सदा माझे डोळे जडो तुझे मूर्ती । रखुमाईच्या पती सोयरिया ॥1॥
                 गोड तुझें रूप गोड तुझें नाम । देईं मज प्रेम सर्व काळ ॥ध्रु.॥ 
                 विठो माउलिये हा चि वर देईं । संचरोनि राहीं हृदयामाजी ॥2॥ 
                 तुका ह्मणे कांहीं न मागे आणीक । तुझे पायीं सुख सर्व आहे ॥3॥
4
               राजस सुकुमार मदनाचा पुतळा । रविशशिकळा लोपलिया ॥1॥ 
                 कस्तुरीमळवट चंदनाची उटी । रुळे माळ कंठीं वैजयंती ॥ध्रु.॥ 
                 मुगुट कुंडले श्रीमुख शोभलें । सुखाचें ओतलें सकळ ही ॥2॥ 
                 कासे सोनसळा पांघरे पाटोळा । घननीळ सांवळा बाइयानो ॥3॥ 
                 सकळ ही तुह्मी व्हा गे एकीसवा । तुका ह्मणे जीवा धीर नाहीं॥4॥
5
               कर कटावरी तुळसीच्या माळा । ऐसें रूप डोळां दावीं हरी ॥1॥ 
                 ठेविले चरण दोन्ही विटेवरी । ऐसें रूप हरी दावीं डोळां ॥ध्रु.॥ 
                 कटीं पीतांबर कास मिरवली । दाखवीं वहिली ऐसी मूर्ती ॥2॥ 
                 गरुडपारावरी उभा राहिलासी । आठवें मानसीं तें चि रूप ॥3॥
                 झुरोनी पांजरा होऊं पाहें आतां । येईं पंढरीनाथा भेटावया ॥4॥
                 तुका ह्मणे माझी पुरवावी आस । विनंती उदास करूं नये ॥5॥
6
               गरुडाचें वारिकें कासे पीतांबर । सांवळें मनोहर कैं देखेन ॥1॥ 
                 बरवया बरवंटा घनमेघ सांवळा । वैजयंतीमाळा गळां शोभे ॥ध्रु.॥ 
                 मुगुट माथां कोटि सूर्यांचा झळाळ । कौस्तुभ निर्मळ शोभे कंठीं ॥2॥ 
                 ओतींव श्रीमुख सुखाचें सकळ । वामांगीं वेल्हाळ रखुमादेवी ॥3॥
                 उद्धव अक्रूर उभे दोहींकडे । वर्णिती पवाडे सनकादिक ॥4॥
                 तुका ह्मणे नव्हे आणिकांसारिखा । तो चि माझा सखा पांडुरंग ॥5॥
॥6॥
विराण्या - अभंग 25 7
               वाळो जन मज ह्मणोत शिंदळी । परि हा वनमाळी न विसंबें ॥1॥ 
                 सांडूनि लौकिक जालियें उदास । नाहीं भय आस जीवित्वाची ॥2॥
                 नाइकें वचन बोलतां या लोकां । ह्मणे जालों तुका हरिरता ॥3॥
8
              आधिल्या भ्रतारें काम नव्हे पुरा । ह्मणोनि व्यभिचारा टेकलियें ॥1॥ 
                रात्रंदिस मज पाहिजे जवळी । क्षण त्यानिराळी न गमे घडी ॥2॥
                नाम गोष्टी माझी सोय सांडा आतां । रातलें अनंता तुका ह्मणे ॥3॥
9
              हाचि नेम आतां न फिरें माघारी । बैसलें शेजारीं गोविंदाचे ॥1॥ 
                घररिघी जालें पट्टराणी बळें । वरिलें सांवळें परब्रह्म ॥2॥
                बळियाचा अंगसंग जाला आतां । नाहीं भय चिंता तुका ह्मणे ॥3॥
10
              नाहीं काम माझें काज तुह्मांसवें । होतें गुप्त ठावें केलें आतां ॥1॥ 
                व्यभिचार माझा पडिला ठाउका । न सर ती लोकांमाजी जालें ॥2॥
                न धरावा लोभ कांहीं मजविशीं । जालें देवपिशी तुका ह्मणे॥3॥
11
विसरले कुळ आपुला आचार । पती भावे दीर घर सोय ॥1॥ 
सांडिला लौकिक लाज भय चिंता । रातलें अनंता चित्त माझें ॥2॥
मज आतां कोणी आळवाल झणी । तुका ह्मणे कानीं बहिरी जालें ॥3॥
12
न देखें न बोलें नाइकें आणीक । बैसला हा एक हरि चित्तीं ॥1॥
सासुरें माहेर मज नाहीं कोणी । एक केलें दोन्ही मिळोनियां॥2॥
आळ आला होता आह्मी भांडखोरी । तुका ह्मणे खरी केली मात ॥3॥
13
दुजा ऐंसा कोण बळी आहे आतां । हरि या अनंता पासूनिया ॥1॥
बिळयाच्या आह्मी जालों बिळवंता । करूं सर्व सत्ता सर्वांवरी ॥2॥
तुका ह्मणे आह्मी जिवाच्या उदारा । जालों प्रीतिकरा गोविंदासी ॥3॥
14
क्षणभरी आह्मी सोसिलें वाईट । साधिलें अवीट निजसुख ॥1॥
सांडी मांडी मागें केल्या भरोवरी । अधिक चि परी दुःखाचिया ॥2॥
तुका ह्मणे येणें जाणें नाहीं आतां । राहिलों अनंताचिये पायीं ॥3॥
15
आह्मां आह्मी आतां वडील धाकुटीं । नाहीं पाठीं पोटीं कोणी दुजें ॥1॥
फावला एकांत एकविध भाव । हरि आह्मांसवें सर्व भोगी ॥2॥
तुका ह्मणे अंगसंग एके ठायीं । असों जेथें नाहीं दुजें कोणी ॥3॥
16
सर्व सुख आह्मी भोगूं सर्व काळ । तोडियेलें जाळ मोहपाश ॥1॥
याचसाठी सांडियेले भरतार । रातलों या परपुरुषाशीं ॥2॥
तुका ह्मणे आतां गर्भ नये धरूं । औषध जें करूं फळ नव्हे ॥3॥
17
एका जिवें आतां जिणें जालें दोहीं । वेगळीक कांहीं नव्हे आतां ॥1॥
नारायणा आह्मां नाहीं वेगळीक । पुरविली हे भाक सांभािळली ॥2॥
तुका ह्मणे जालें सायासाचें फळ । सरली ते वेळ काळ दोन्ही ॥3॥
18
हासों रुसों आतां वाढवूं आवडी । अंतरींची गोडी अवीट ते ॥1॥
सेवासुखें करूं विनोदवचन । आह्मी नारायण एकाएकीं ॥2॥
तुका ह्मणे आह्मी जालों उदासीन । आपुल्या आधीन केला पति ॥3॥
19
मजसवें आतां येऊं नका कोणी । सासुरवासिनी बाइयानो ॥1॥
न साहवे तुह्मां या जनाची कूट । बोलती वाइऩट ओखटें तें ॥2॥
तुका ह्मणे जालों उदास मोकळ्या । विचरों गोवळ्यासवें आह्मी ॥3॥
20
शिकविलें तुह्मीं तें राहे तोंवरी । मज आणि हरी वियोग तों ॥1॥
प्रसंगीं या नाहीं देहाची भावना । तेथें या वचना कोण मानी ॥2॥
तुका ह्मणे चित्तीं बैसला अनंत । दिसों नेदी नित्य अनित्य तें ॥3॥
21
सांगतों तें तुह्मीं अइकावें कानीं । आमुचे नाचणीं नाचूं नका ॥1॥
जोंवरी या तुह्मां मागिलांची आस । तोंवरी उदास होऊं नका ॥2॥
तुका ह्मणे काय वांयांविण धिंद । पति ना गोविंद दोन्ही नाहीं ॥3॥
22
आजिवरी तुह्मां आह्मां नेणपण । कौतुकें खेळणें संग होता ॥1॥
आतां अनावर जालें अगुणाची । करूं नये तें चि करीं सुखें ॥2॥
तुका ह्मणे आतां बुडविलीं दोन्ही । कुळें एक मनीं नारायण ॥3॥
23
सासुरियां वीट आला भरतारा । इकडे माहेरा स्वभावें चि ॥1॥
सांडवर कोणी न धरिती हातीं । प्रारब्धाची गति भोगूं आतां ॥2॥
न व्हावी ते जाली आमुची भंडाई । तुका ह्मणे काई लाजों आतां ॥3॥
24
मरणाही आधीं राहिलों मरोनी । मग केलें मनीं होतें तैसें ॥1॥
आतां तुह्मी पाहा आमुचें नवल । नका वेचूं बोल वांयांविण ॥2॥
तुका ह्मणे तुह्मी भयाभीत नारी । कैसे संग सरी तुह्मां आह्मां ॥3॥
25
परपुरुषाचें सुख भोगे तरी । उतरोनि करीं घ्यावें सीस ॥1॥
संवसारा आगी आपुलेनि हातें । लावूनि मागुतें पाहूं नये ॥2॥
तुका ह्मणे व्हावें तयापरी धीट । पतंग हा नीट दीपासोई ॥3॥
26
अइकाल परी ऐसें नव्हे बाई । न संडा या सोई भ्रताराची ॥1॥
नव्हे आराणुक लौकिकापासून । आपुल्या आपण गोविलें तें ॥2॥
तुका ह्मणे मन कराल कठीण । त्या या निवडोन मजपाशीं ॥3॥
27
आहांच वाहांच आंत वरी दोन्ही । न लगा गडणी आह्मां तैशा ॥1॥
भेऊं नये तेथें भेडसावूं कोणा । आवरूनि मना बंद द्यावा ॥2॥
तुका ह्मणे कांहीं अभ्यासावांचुनी । नव्हे हे करणी भलतीची ॥3॥
28
बहुतांच्या आह्मी न मिळों मतासी । कोणी कैसी कैसी भावनेच्या ॥1॥
विचार करितां वांयां जाय काळ । लटिकें तें मूळ फजितीचें ॥2॥
तुका ह्मणे तुह्मी करा घटापटा । नका जाऊं वाटा आमुचिया ॥3॥
29
त्याचें सुख नाहीं आलें अनुभवा । कठिण हें जिवा तोंचिवरी ॥1॥
मागिलांचे दुःख लागों नेदी अंगा । अंतर हें संगा नेदी पुढें ॥2॥
तुका ह्मणे सर्वविशीं हा संपन्न । जाणती महिमान श्रुति ऐसें ॥3॥
30
न राहे रसना बोलतां आवडी । पायीं दिली बुडी माझ्या मनें ॥1॥
मानेल त्या तुह्मी अइका स्वभावें । मी तों माझ्याभावें अनुसरलें ॥2॥
तुका ह्मणे तुह्मीं फिरावें बहुतीं । माझी तों हे गती जाली आतां ॥3॥
31
न बोलतां तुह्मां कळों न ये गुज । ह्मणउनी लाज सांडियेली ॥1॥
आतां तुह्मां पुढें जोडीतसें हात । नका कोणी अंत पाहों माझा ॥2॥
तुका ह्मणे आह्मी बैसलों शेजारीं । करील तें हरी पाहों आतां ॥3॥
॥25॥

32
नये जरी तुज मधुर उत्तर । दिधला सुस्वर नाहीं देवें ॥1॥
नाहीं तयाविण भुकेला विठ्ठल । येइल तैसा बोल रामकृष्ण ॥ध्रु.॥
देवापाशीं मागें आवडीची भक्ति । विश्वासेंशीं प्रीति भावबळें ॥2॥
तुका ह्मणे मना सांगतों विचार । धरावा निर्धार दिसेंदिस ॥3॥
33
सावध जालों सावध जालों । हरिच्या आलों जागरणा ॥1॥
तेथें वैष्णवांचे भार । जयजयकार गर्जतसे ॥ध्रु.॥
पळोनियां गेली झोप । होतें पाप आड तें ॥2॥
तुका ह्मणे त्या ठाया । ओल छाया कृपेची ॥3॥
34
आपुलिया हिता जो असे जागता । धन्य माता पिता तयाचिया ॥1॥ 
कुळीं कन्यापुत्र होतीं जीं सात्त्विक । तयाचा हरिख वाटे देवा ॥ध्रु.॥ 
गीता भागवत करिती श्रवण । आणीक चिंतन विठोबाचें ॥2॥ 
तुका ह्मणे मज घडो त्याची सेवा । तरी माझ्या दैवा पार नाहीं ॥3॥
35
अंतरींची घेतो गोडी । पाहे जोडी भावाची ॥1॥
देव सोयरा देव सोयरा । देव सोयरा दीनाचा ॥ध्रु.॥ 
आपुल्या वैभवें । शृंगारावें निर्मळ ॥2॥
तुका ह्मणे जेवी सवें । प्रेम द्यावें प्रीतीचें ॥3॥
36 सुखें वोळंब दावी गोहा । माझें दुःख नेणा पाहा ॥1॥ आवडीचा मारिला वेडा । होय होय कैसा ह्मणे भिडा ॥ध्रु.॥ निपट मज न चले अन्न । पायली गहूं सांजा तीन ॥2॥ गेले वारीं तुह्मीं आणिली साकर । सातदी गेली साडेदहा शेर ॥3॥ अखंड मज पोटाची व्यथा । दुधभात साकर तुप पथ्या ॥4॥ दो प्रहरा मज लहरी येती । शुद्ध नाही पडे सुपती॥5॥ नीज न यें घाली फुलें । जवळी न साहती मुलें॥6॥ अंगी चंदन लाविते भाळी । सदा शूळ माझे कपाळी॥7॥ हाड गळोनी आले मांस । माझें दुख: तुम्हा नेणवे कैसे॥8॥ तुका म्हणे जिता गाढव मेला । मेलियावरी नरका गेला ॥9॥

37 पावलें पावलें तुझें आम्हा सर्व । दुजा नको भाव होऊं देऊं ॥1॥ जेथें तेथें तुझींच पाउलें । त्रिभुवन संचलें विठ्ठला गा ॥ध्रु.॥ भेदाभेद मतें भ्रमाचे संवाद । आम्हां नको वाद त्यांशी देऊं ॥2॥ तुका म्हणे अणु तुजविण नाहीं । नभाहूनि पाहीं वाढ आहे ॥3॥

38 वंदू चरणरज सेवूं उष्टावळी । पूर्वकर्मा होळी करुनी सांडूं ॥1॥ अमुप हे गाठी बांधूं भांडवल । अनाथा विठ्ठल आम्हां जोगा ॥ध्रु.॥ अवघे होती लाभ एका या चिंतनें । नामसंकीर्तने गोविंदाच्या ॥2॥ जन्म मरणाच्या खुंटतील खेपा । होईल सोपा सिद्ध पंथ ॥3॥ गेले पुढें त्यांचा शोधीत मारग । चला जाऊं घेत माग आम्ही ॥4॥ तुका म्हणे घालूं जीवपणा चिरा । जाऊं त्या माहेरा निजाचिया ॥5॥

39 जेविले ते संत मागें उष्टावळी । अवघ्या पत्रावळी करुनी झाडा ॥1॥ सोवळ्या ओंवळ्या राहिलो निराळा । पासूनि सकळा अवघ्या दुरीं ॥ध्रु.॥ परें परतें मज न लागे सांगावे । हें तों देवें बरें शिकविलें ॥2॥ दुस-यातें आम्ही नाही आतळत । जाणोनि संकेत उभा असें ॥3॥ येथें कोणी काही न धरावी शंका मज चाड एका भोजनाची ॥4॥ लाचावला तुका मारीतसे झड ! पुरविलें कोड नारायणें ॥5॥

40 देवाच्या प्रसादे करा रे भोजन । व्हाल कोण कोण अधिकारी तें ॥1॥ ब्रह्मादिकांसि हें दुर्लभ उच्छिष्ट । नका मानू वीट ब्रह्मरसीं ॥ध्रु.॥ अवघियां पुरते वोसंडलें पात्र । अधिकार सर्वत्र आहे येथे ॥2॥ एच्छादानी येथें वळला समर्थ । अवघे चि आर्त पुरवितो ॥3॥ सरे येथें ऐसें नाहीं कदाकाळीं । पुढती वाटे कवळीं घ्यावें ऐसें ॥4॥ तुका म्हणे पाक लक्षुमीच्या हातें । कामारीसांगाते निरुपम ॥5॥

41 अवगुणांचे हाती । आहे अवघी फजीती ॥1॥ नाहीं पात्रासवें चाड । प्रमाण तें फिकें गोड ॥ध्रु.॥ विष तांब्या वाटी । भरली लावूं नये होटीं ॥2॥ तुका म्हणे भाव । शुद्ध बरा सोंग वाव ॥3॥

42 हरीच्या जागरणा । जातां कां रे नये मना । कोठें पाहासील तुटी । आयुष्य वेचें फुकासाठी । ज्यांची तुज गुंती । ते तों मोकलिती अंती । तुका म्हणे बरा । लाभ काय तो विचारा ।

43 धर्माची तूं मूर्ती । पाप-पुण्य तुझे हाती । मज सोडवी दातारा । कर्मापासोनी दुस्तरा ॥ध्रु.॥ करीसी अंगिकार । तरी काय माझा भार । जीवींच्या जीवना । तुका म्हणे नारायणा ।

44 ब्रह्मादिक जया लाभासि ठेंगणे । बळिये आम्ही भले शरणागत ।।1।। कामनेच्या त्यागे भजनाचा लाभ । जाला पद्मनाभ सेवाणी ।।ध्रु।। कामधेनूचिया क्षीरा पार नाही ।इच्छेचिये वाही वरुषावे ।।2।। बैसलिये ठायीं लगलें भरतें । त्रिपुटी वरतें भेदी ऐसें ।।3।। हरि नाही आम्हां विष्णुदासां जगीं । नारायण अंगी विसावला ।।4।। तुका म्हणे बहु लाटे हें भोजन । नाहीं रिता क़ोण राहत राहों ।।5।।

दुजें खंडे तरी । उरला तो अवघा हरि ।। आपणाबाहेरी । न लगे ठाव धुंडावा ।।1।। इतुलें जाणावया जाणा । कोंडें तरी मनें मना ।। पारधीच्या खुणा । जाणतें चि साधावे ।।ध्रु।। देह आधी काय खरा । देहसंबंधपसारा ।। बुजगावणें चोरा । रक्षणसें भासतें ।।2।। तुका करी जागा । नको चाचपूं वाउगा ।। आहेसि तूं आगा । अंगी दोळे उघडी ।।3।।

46 विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म । भेदाभेद भ्रम अमंगळ ।।1।। अइका जी तुम्ही भक्त भागवत । कराल तें हित सत्य करा ।।ध्रु।। कोणा ही जिवाचा न घडो मत्सर । वर्म सर्वेश्वर पूजनाचे ।।2।। तुका म्हणे एका देहाचे अवयव । सुख दु:ख जीव भोग पावे ।।3।।

47 आम्ही जरी आस । जालों टाकोनी उदास ।।1।। आतां कोण भय धरी । पुढें मरणाचें हरी ।।ध्रु।। भलते ठायीं पडों । देह तुरंगी हा चढो ।।2।। तुमचं तुम्हांपासीं । आम्ही आहों जैसीं तैसीं ।।3।। गेलेमानामान । सुखदु:खाचें खंडन ।।4।। तुका म्हणे चिती । नाहीं वागवीत खंती ।।5।।

48 निंदी कोणी मारी । वंदी कोणी पूजा करी ।।1।। मज हें ही नाहीं तें ही नाहीं । वेगळा दोहीं पासुनी ।।ध्रु।। देहभोग भोगें घडे । जें जें जोडे तें बरें ।।2।। अवघें पावे नारायणी । जनार्दनीं तुक्याचें ।।3।।

49 जन विजन जालें आम्हां । विठ्ठल नामा प्रमाणें ।।1।। पाहें तिकडे बापमाय । विठ्ठल आहे रखुमाई ।।ध्रु।। वन पट्टण एकभाव । अवघा ठाव सरता जाला ।।2।। आठव नाहीं सुखदु:खा । नाचे तुका कौतुकें ।।3।।

50 हिरा ठेवितां ऐरणीं । वांचे मारितां जो घणीं ।।1।। तोचिमोल पावे खरा । करणीचा होय चुरा ।।ध्रु।। मोहरा होय तोचि अंगे । सूत न जळे ज्याचे संगे ।।2।। तुका म्हणे तोचि संत । सिसी जगाचे आघात ।।3।।
51
आलिंगनें घडे । मोक्ष सायुज्यता जोडे ॥1॥
ऐसा संताचा महिमा । जाली बोलायाची सीमा ॥ध्रु.॥ 
तीर्थे पर्वकाळ । अवघीं पायांपें सकळ ॥2॥
तुका ह्मणे देवा । त्यांची केली पावे सेवा ॥3॥
52
माझिया मीपणा । जाला यावरी उगाणा ॥1॥
भोगी त्यागी पांडुरंग । त्यानें वसविलें अंग ॥ध्रु.॥ 
टािळलें निमित्त । फार थोडें घात हित ॥2॥
यावें कामावरी । तुका ह्मणे नाहीं उरी ॥3॥
53
सकळ चिंतामणी शरीर । जरी जाय अहंकार आशा समूळ ॥ 
निंदा हिंसा नाहीं कपट देहबुिद्ध । निर्मळ स्फटिक जैसा ॥1॥
मोक्षाचें तीर्थ न लगे वाराणसी । येती तयापासीं अवघीं जनें॥ 
तीर्थांसी तीर्थ जाला तो चि एक । मोक्ष तेणें दर्शनें ॥ध्रु.॥ 
मन शुद्ध तया काय करिसी माळा । मंडित सकळा भूषणांसी ॥ 
हरिच्या गुणें गर्जताती सदा । आनंद तया मानसीं ॥2॥
तन मन धन दिलें पुरुषोत्तमा । आशा नाहीं कवणाची ॥ 
तुका ह्मणे तो परिसाहूनि आगळा । काय महिमा वर्णूं त्याची ॥3॥
54
आहे तें सकळ कृष्णा चि अर्पण । न कळतां मन दुजें भावी ॥1॥
ह्मणउनी पाठी लागतील भूतें । येती गवसीत पांचजणें ॥ध्रु.॥ 
ज्याचे त्या वंचलें आठव न होतां । दंड या निमित्ताकारणें हा ॥2॥
तुका ह्मणे काळें चेंपियेला गळा । मी मी वेळोवेळा करीतसे ॥3॥
55
महारासि सिवे । कोपे ब्राह्मण तो नव्हे ॥1॥
तया प्रायश्चित्त कांहीं । देहत्याग करितां नाहीं ॥ध्रु.॥ 
नातळे चांडाळ । त्याचा अंतरीं विटाळ ॥2॥
ज्याचा संग चित्तीं । तुका ह्मणे तो त्या याती ॥3॥
56
तेलनीशीं रुसला वेडा । रागें कोरडें खातो भिडा ॥1॥
आपुलें हित आपण पाही । संकोच तो न धरी कांहीं ॥ध्रु.॥ 
नावडे लोकां टाकिला गोहो । बोडिले डोकें सांडिला मोहो ॥2॥
शेजारणीच्या गेली रागें ।कुत†यांनी घर भरिलें मागें ॥3॥
पिसारागें भाजिलें घर । नागविलें तें नेणे फार ॥4॥
तुका ह्मणे वांच्या रागें । फेडिलें सावलें देखिलें जगें ॥5॥
57
मज दास करी त्यांचा । संतदासांच्या दासांचा ॥1॥
मग होत कल्पवरी । सुखें गर्भवास हरी ॥ध्रु.॥ 
नीचवृत्तिकाम । परी मुखीं तुझें नाम ॥2॥
तुका ह्मणे सेवे । माझे संकल्प वेचावे ॥3॥
58
सदा तळमळ । चित्ताचिये हळहळ ॥1॥
त्याचें दर्शन न व्हावें । शव असतां तो जिवे ॥ध्रु.॥ 
कुशब्दाची घाणी । अमंगळविली वाणी ॥2॥
नेणे शब्द पर । तुका ह्मणे परउपकार ॥3॥
59
जया नाहीं नेम एकादशीव्रत । जाणावें तें प्रेत शव लोकीं ॥1॥
त्याचें वय नित्य काळ लेखीताहे । रागें दात खाय कराकरा ॥ध्रु.॥ 
जयाचिये द्वारीं तुळसीवृंदावन । नाहीं तें स्मशान गृह जाणां ॥2॥
जये कुळीं नाहीं एक ही वैष्णव । त्याचा बुडे भवनदीतापा ॥3॥
विठोबाचें नाम नुच्चारी जें तोंड । प्रत्यक्ष तें कुंड रजकाचें ॥4॥
तुका ह्मणे त्याचे काष्ठ हातपाय । कीर्तना नव जाय हरीचिया ॥5॥
60
आह्मी सदैव सुडके । जवळीं येतां चोर धाके ॥ जाऊं पुडी भिकें । कुतरीं घर राखती ॥1॥
नांदणूक ऐसी सांगा । नाहीं तरी वांयां भागा ॥ थोरपण अंगा । तरी ऐसें आणावें ॥ध्रु.॥ 
अक्षय साचार । केलें सायासांनी घर ॥ एरंडसिंवार । दुजा भार न साहती ॥2॥
धन कण घरोघरीं । पोट भरे भिकेवरी ॥ जतन तीं करी । कोणगुरें वासरें ॥3॥
जाली सकळ नििंश्चती । भांडवल शेण माती । झळझळीत भिंती । वृंदावनें तुळसीचीं ॥4॥
तुका ह्मणे देवा । अवघा निरविला हेवा ॥ कुटुंबाची सेवा । तो चि करी आमुच्या ॥5॥
61
पराविया नारी माउलीसमान । मानिलिया धन काय वेचे ॥1॥
न करितां परनिंदा द्रव्य अभिलाष । काय तुमचें यास वेचे सांगा ॥ध्रु.॥ 
बैसलिये ठायी ह्मणतां रामराम । काय होय श्रम ऐसें सांगा ॥2॥
संताचे वचनीं मानितां विश्वास । काय तुमचें यास वेचे सांगा ॥3॥
खरें बोलतां कोण लागती सायास । काय वेचे यास ऐसें सांगा ॥4॥
तुका ह्मणे देव जोडे याचसाटीं । आणीक ते आटी न लगे कांहीं ॥5॥
62
शुद्धबीजा पोटीं । फळें रसाळ गोमटीं ॥1॥
मुखीं अमृताची वाणी । देह वेचावा कारणीं ॥ध्रु.॥ 
सर्वांगीं निर्मळ । चित्त जैसें गंगाजळ ॥2॥
तुका ह्मणे जाती । ताप दर्शनें विश्रांती ॥3॥
63
चित्त समाधानें । तरी विष वाटे सोनें ॥1॥
बहु खोटा अतिशय । जाणां भले सांगों काय ॥ध्रु.॥ 
मनाच्या तळमळें । चंदनें ही अंग पोळे ॥2॥
तुका ह्मणे दुजा । उपचार पीडा पूजा ॥3॥
64
परिमळ ह्मूण चोळूं नये फूल । खाऊं नये मूल आवडतें ॥1॥
मोतियाचें पाणी चाखूं नये स्वाद । यंत्र भेदुनि नाद पाहूं नये ॥2॥
कर्मफळ ह्मणुनी इच्छूं नये काम । तुका ह्मणे वर्म दावूं लोकां ॥3॥
65
माया तें चि ब्रह्म ब्रह्म तेंचि माया । अंग आणि छाया तया परी ॥1॥
तोडितां न तुटे सारितां निराळी । लोटांगणांतळीं हारपते ॥ध्रु.॥ 
दुजें नाहीं तेथें बळ कोणासाठीं । आणिक ते आटी विचाराची ॥2॥
तुका ह्मणे उंच वाढे उंचपणें । ठेंगणीं लवणें जैसीं तैसीं ॥3॥
66
दुर्जनासि करी साहे । तो ही दंड हे लाहे ॥1॥
शिंदळीच्या कुंटणी वाटा । संग खोटा खोट्याचा ॥ध्रु.॥ 
येर येरा कांचणी भेटे। आगी उठे तेथूनी ॥2॥
तुका ह्मणे कापूं नाकें । पुढें आणिकें शिकविती ॥3॥
67
वृत्ति भूमि राज्य द्रव्य उपाजिऩती । जाणा त्या निश्चितीं देव नाहीं ॥1॥
भाडेकरी वाहे पाठीवरी भार । अंतरींचें सार लाभ नाहीं ॥ध्रु.॥ 
देवपूजेवरी ठेवूनियां मन । पाषाणा पाषाण पूजी लोभें ॥2॥
तुका ह्मणे फळ चिंतिती आदरें । लाघव हे चार शिंदळीचे ॥3॥
68
पवित्र सोंवळीं । एक तीं च भूमंडळीं ॥1॥
ज्यांचा आवडता देव । अखंडित प्रेमभाव ॥ध्रु.॥ 
तीं च भाग्यवंतें । सरतीं पुरतीं धनवित्तें ॥2॥
तुका ह्मणे देवा । त्यांची केल्या पावे सेवा ॥3॥